रबी 2025–26 के लिए एनबीएस सब्सिडी मंजूर, कृषि लागत और उत्पादकता पर बड़ा असर

Tue 06-Jan-2026,12:45 AM IST +05:30

ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |

Follow Us

रबी 2025–26 के लिए एनबीएस सब्सिडी मंजूर, कृषि लागत और उत्पादकता पर बड़ा असर रबी-2025–26-के-लिए-एनबीएस-सब्सिडी-मंजूर
  • रबी 2025–26 के लिए एनबीएस सब्सिडी से किसानों को डीएपी और एनपीके उर्वरक वहनीय दामों पर उपलब्ध होंगे।

  • एनबीएस योजना से पी एंड के उर्वरकों का घरेलू उत्पादन 2014 से 2025 तक 50% से अधिक बढ़ा।

  • डिजिटल IFMS सिस्टम से उर्वरक वितरण, एमआरपी और सब्सिडी पर पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित हुई।

Delhi / New Delhi :

दिल्ली/ भारत सरकार ने रबी सीजन 2025–26 के लिए भारतीय कृषि में वहनीयता और उत्पादकता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) दरों को स्वीकृति प्रदान की है। यह निर्णय 5 जनवरी 2026 को सामने आया, जिसका उद्देश्य किसानों को आवश्यक उर्वरक उचित और वहनीय कीमतों पर उपलब्ध कराना, मृदा स्वास्थ्य को संतुलित रखना और दीर्घकालिक कृषि स्थिरता को मजबूत करना है। यह सब्सिडी व्यवस्था 1 अक्टूबर 2025 से 31 मार्च 2026 तक प्रभावी रहेगी और फॉस्फेटिक एवं पोटाशिक (पी एंड के) उर्वरकों पर लागू होगी, जिनमें डीएपी, एमओपी, एसएसपी और विभिन्न एनपीके एवं एनपीकेएस ग्रेड शामिल हैं। सरकार का यह कदम ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है और किसानों की इनपुट लागत को नियंत्रित रखना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

कृषि मंत्रालय और रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, रबी 2025–26 के लिए एनबीएस योजना के अंतर्गत लगभग ₹37,952 करोड़ की अनुमानित बजटीय आवश्यकता तय की गई है। यह राशि खरीफ 2025 की तुलना में लगभग ₹736 करोड़ अधिक है, जो यह दर्शाती है कि सरकार किसानों को राहत देने के लिए अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाने को तैयार है। बीते वर्षों में उर्वरक सब्सिडी पर लगातार बढ़ता खर्च इस बात का संकेत है कि सरकार खेती को लाभकारी और टिकाऊ बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। वर्ष 2022–23 से 2024–25 के बीच एनबीएस योजना के तहत ₹2.04 लाख करोड़ से अधिक की सब्सिडी आवंटित की जा चुकी है, जिससे उर्वरकों की वहनीय उपलब्धता बनी रही है।

पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना को पहली बार 1 अप्रैल 2010 से लागू किया गया था। यह योजना उर्वरक क्षेत्र में एक बड़े नीतिगत बदलाव का प्रतीक बनी, क्योंकि इसके तहत उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी को उनके पोषक तत्वों की मात्रा से जोड़ा गया। इस व्यवस्था में मुख्य रूप से नाइट्रोजन (एन), फॉस्फोरस (पी), पोटाश (के) और सल्फर (एस) जैसे पोषक तत्वों को आधार बनाया गया। इसका उद्देश्य किसानों को किसी एक उर्वरक पर अत्यधिक निर्भर होने से रोकना, संतुलित उर्वरीकरण को बढ़ावा देना और मृदा में पोषक तत्वों के असंतुलन की समस्या को दूर करना रहा है। इसके साथ ही, द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग को प्रोत्साहित कर मृदा क्षरण जैसी दीर्घकालिक समस्याओं से निपटने का प्रयास किया गया है।

एनबीएस योजना के सकारात्मक परिणाम बीते एक दशक में स्पष्ट रूप से देखने को मिले हैं। इस योजना के चलते देश में फॉस्फेटिक एवं पोटाशिक उर्वरकों के घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2014 में पी एंड के उर्वरकों (डीएपी और एनपीकेएस सहित) का कुल उत्पादन 112.19 लाख मीट्रिक टन था, जो बढ़कर वर्ष 2025 (30 दिसंबर तक) 168.55 लाख मीट्रिक टन हो गया है। यह 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में उर्वरक क्षेत्र की मजबूत प्रगति को रेखांकित करता है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम हुई है और आपूर्ति श्रृंखला अधिक स्थिर बनी है।

सरकार ने रबी 2025–26 के लिए पोषक तत्वों पर प्रति किलोग्राम सब्सिडी दरें भी अधिसूचित की हैं। इसके तहत नाइट्रोजन (एन) पर ₹43.02 प्रति किलोग्राम, फॉस्फोरस (पी) पर ₹47.96 प्रति किलोग्राम, पोटाश (के) पर ₹2.38 प्रति किलोग्राम और सल्फर (एस) पर ₹2.87 प्रति किलोग्राम सब्सिडी तय की गई है। इन दरों के आधार पर विभिन्न पी एंड के उर्वरक ग्रेडों पर उत्पादवार सब्सिडी निर्धारित की गई है, जिससे किसानों को अलग-अलग फसलों और मृदा आवश्यकताओं के अनुसार उर्वरक चुनने में सुविधा मिलती है।

रबी 2025–26 के लिए डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) पर सब्सिडी को बढ़ाकर ₹29,805 प्रति मीट्रिक टन कर दिया गया है, जो रबी 2024–25 में ₹21,911 प्रति मीट्रिक टन थी। डीएपी देश के सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले उर्वरकों में से एक है, और इसकी सब्सिडी बढ़ाने से गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों की खेती करने वाले किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। इसके साथ ही, रबी 2025–26 के लिए अमोनियम सल्फेट को भी एनबीएस योजना में शामिल किया गया है, चाहे वह घरेलू उत्पादन हो या आयातित, जिससे सल्फर की कमी वाली मिट्टियों में फसल उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलेगी।

एनबीएस योजना के दायरे को और व्यापक बनाते हुए सरकार ने उर्वरक ग्रेडों की संख्या भी बढ़ाई है। रबी 2023–24 तक इस योजना के तहत 25 पी एंड के उर्वरक ग्रेड शामिल थे, लेकिन खरीफ 2024 से तीन नए ग्रेड इसमें जोड़े गए। इनमें मैग्नीशियम, जिंक, बोरॉन और सल्फर से सुदृढ़ एनपीके (11:30:14), यूरिया-एसएसपी कॉम्प्लेक्स (5:15:0:10) और सुदृढ़ एसएसपी (0:16:0:11) शामिल हैं। अब कुल मिलाकर 28 प्रकार के पी एंड के उर्वरक किसानों को अधिकृत निर्माताओं और आयातकों के माध्यम से सब्सिडीयुक्त दरों पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

सरकार ने सुदृढ़ीकृत और लेपित उर्वरकों को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन भी जारी रखा है। एनबीएस योजना के तहत बोरॉन से सुदृढ़ उर्वरकों पर ₹300 प्रति मीट्रिक टन और जिंक से सुदृढ़ उर्वरकों पर ₹500 प्रति मीट्रिक टन अतिरिक्त सब्सिडी दी जाएगी। इसका उद्देश्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करना और फसलों की गुणवत्ता एवं उपज दोनों में सुधार करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग दीर्घकाल में मृदा स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

एनबीएस योजना के प्रभाव से कृषि उत्पादकता में भी स्पष्ट सुधार देखा गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में खाद्य अनाज की औसत उपज 2010–11 में 1,930 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, जो बढ़कर 2024–25 में 2,578 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है। यह वृद्धि संतुलित उर्वरीकरण, बेहतर कृषि पद्धतियों और समय पर उर्वरकों की उपलब्धता का परिणाम मानी जा रही है। इससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि हुई है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत हुई है।

उर्वरक वितरण में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (आईएफएमएस) को सशक्त बनाया है। यह एक वेब-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसके माध्यम से उर्वरकों के उत्पादन, आयात, परिवहन और खुदरा वितरण की रियल-टाइम निगरानी की जाती है। आईएफएमएस के जरिए डीलर पंजीकरण, स्टॉक उपलब्धता, डीबीटी रिपोर्ट और एमआईएस डेटा तक पहुंच संभव होती है। इससे कालाबाजारी, अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से अधिक वसूली और आपूर्ति में गड़बड़ियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया है।

एनबीएस योजना के तहत पी एंड के उर्वरक क्षेत्र को असंयंत्रित प्रणाली के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें कंपनियां सरकार की निगरानी में अपना एमआरपी तय कर सकती हैं। हालांकि, कंपनियों को अपनी लागत संरचना और एमआरपी की नियमित रिपोर्टिंग करनी होती है। यदि निर्धारित सीमा से अधिक लाभ पाया जाता है, तो उसे अनुचित मानते हुए वसूली की जाती है। उर्वरक के प्रत्येक थैले पर एमआरपी और प्रति थैला व प्रति किलोग्राम लागू सब्सिडी का स्पष्ट उल्लेख अनिवार्य किया गया है। मुद्रित एमआरपी से अधिक मूल्य वसूलना आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत दंडनीय अपराध है।

सरकार राज्यों के साथ मिलकर उर्वरक आपूर्ति की निरंतर निगरानी भी कर रही है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग और उर्वरक विभाग राज्य कृषि अधिकारियों के साथ नियमित वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित करते हैं, ताकि किसी भी क्षेत्र में संभावित कमी या आपूर्ति संबंधी समस्या का समय रहते समाधान किया जा सके। मासिक आपूर्ति योजना के माध्यम से उर्वरकों का आवंटन किया जाता है, जिससे किसानों को बुवाई और फसल वृद्धि के महत्वपूर्ण चरणों में किसी प्रकार की परेशानी न हो।

कुल मिलाकर, पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना भारतीय कृषि नीति का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरी है। रबी 2025–26 के लिए स्वीकृत नई दरें यह दर्शाती हैं कि सरकार संतुलित उर्वरीकरण, मृदा स्वास्थ्य, घरेलू उत्पादन और किसान कल्याण को एक साथ आगे बढ़ाने के लिए गंभीर प्रयास कर रही है। बढ़ती सब्सिडी, उर्वरक ग्रेडों का विस्तार, डिजिटल निगरानी और घरेलू उत्पादन में निरंतर वृद्धि ने इस योजना को किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी बनाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह नीतिगत स्थिरता और प्रभावी क्रियान्वयन जारी रहा, तो एनबीएस योजना आने वाले वर्षों में भारतीय कृषि को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएगी।